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छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड का निकाह पर नया आदेश जानिए क्या कहता है देश का कानून?

1002065321 छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड का निकाह पर नया आदेश जानिए क्या कहता है देश का कानून?

रायपुर/ छत्तीसगढ़ राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज ने आगामी अगस्त 2026 से प्रदेश के भीतर निकाह (निकाहनामा) और मौलानाओं के संदर्भ में एक नई प्रशासनिक नियमावली लागू करने की घोषणा की है। इस नए नियम के अंतर्गत राज्य के समस्त शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के काजियों व मौलानाओं को वक्फ बोर्ड के नियमों के तहत अपना अनिवार्य पंजीकरण कराना होगा। बोर्ड के इस नियम में यह स्पष्ट उल्लेख है कि भविष्य में केवल बोर्ड द्वारा अधिकृत मौलाना ही निकाह संपन्न करा सकेंगे और नियमों की अवहेलना करने वाले मौलवियों के संदर्भ में विधिक समीक्षा की जाएगी। इसके अतिरिक्त, अंतर-धार्मिक विवाहों के मामलों की सघन समीक्षा के लिए बोर्ड द्वारा एक सात-सदस्यीय विद्वानों की समिति गठित करने का प्रावधान किया गया है, जिसकी पूर्व अनुमति के बिना स्थानीय काजी सीधे निकाह संपन्न नहीं करा सकेंगे। बोर्ड का पक्ष है कि वर्तमान में अधिकांश निकाहनामे केवल उर्दू भाषा में होते हैं, जिससे नागरिकों को पासपोर्ट अथवा अन्य सरकारी दस्तावेज बनवाने में कठिनाई होती है, इसी समस्या के समाधान हेतु बोर्ड अब हिंदी और अंग्रेजी भाषा में सेंट्रलाइज्ड डिजिटल निकाहनामा जारी करने की योजना बना रहा है।

मूल वक्फ अधिनियम, 1995 वक्फ बोर्ड का वास्तविक अधिकार क्षेत्र

यदि देश के वर्तमान प्रभावी विधिक ढांचे का विश्लेषण करें, तो  वक्फ बोर्ड के मूल प्रशासनिक दायरे को समझने के लिए वक्फ अधिनियम, 1995 के मूल विधिक प्रावधानों और उसकी विशिष्ट धाराओं का बारीकी से विश्लेषण करना अत्यंत आवश्यक है। इस अधिनियम की धारा 1 स्पष्ट रूप से यह प्रतिपादित करती है कि यह कानून संपूर्ण भारत वर्ष पर लागू होता है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक राज्य में गठित होने वाले वक्फ बोर्ड का क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र केवल उसी राज्य की भौगोलिक सीमा के भीतर आने वाली पंजीकृत वक्फ संपत्तियों तक ही सीमित रहता है। अर्थात्, बोर्ड राज्य की सीमा से बाहर या राज्य के भीतर किसी भी ऐसी गतिविधि पर नियंत्रण नहीं रख सकता जो सीधे तौर पर वक्फ संपत्ति से संबद्ध न हो। इसी अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण धारा 32 है, जो बोर्ड के कार्यों और शक्तियों का वैधानिक दायरा तय करती है। धारा 32 की उपधारा 1 के अनुसार, राज्य वक्फ बोर्ड का मुख्य कर्तव्य अपनी क्षेत्रीय सीमा में आने वाली समस्त वक्फ संपत्तियों जैसे मस्जिद, दरगाह, कब्रिस्तान एवं वक्फ भूमि का सामान्य अधीक्षण, वित्तीय प्रबंधन और प्रशासन करना है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वक्फ की आय का उपयोग उसी धार्मिक या धर्मार्थ कार्य के लिए हो रहा है जिसके लिए वह संपत्ति दान की गई थी। इस धारा के अंतर्गत बोर्ड को केवल वक्फ के वित्तीय खातों का ऑडिट करने, मस्जिदों या दरगाहों के प्रबंधन के लिए ‘मुतवल्ली’ (प्रबंधक) की नियुक्ति करने या उन्हें हटाने और वक्फ डीड के अनुसार प्रशासनिक दिशा-निर्देश जारी करने का अधिकार प्राप्त है। इस मूल कानून में कहीं भी मुस्लिम समाज के व्यक्तिगत विधिक अधिकारों, जैसे निकाह संपन्न कराना या स्वतंत्र विवाह संवीक्षा समितियां बनाना, को नियंत्रित करने का कोई वैधानिक अधिकार राज्य वक्फ बोर्ड को नहीं दिया गया है। इसके अतिरिक्त, मूल अधिनियम की धारा 36 और 37 के अंतर्गत राज्य वक्फ बोर्ड को अपनी क्षेत्रीय सीमा के भीतर आने वाली सभी संपत्तियों का एक आधिकारिक रजिस्टर और रिकॉर्ड बनाए रखना होता है, जिसमें प्रत्येक मुतवल्ली के लिए वक्फ बोर्ड के पास संपत्ति का विवरण दर्ज कराना अनिवार्य किया गया है। वक्फ अधिनियम, 1995 की इन सभी मूल धाराओं का संयुक्त अध्ययन विधिक रूप से यह प्रतिपादित करता है कि कानूनन राज्य वक्फ बोर्ड मूल रूप से केवल एक ‘प्रॉपर्टी और फाइनेंशियल मैनेजमेंट’ निकाय है, न कि कोई सामाजिक या धार्मिक विधिक अदालत। बोर्ड का क्षेत्राधिकार केवल वक्फ संपत्तियों की बाउंड्री तक ही सीमित है, और वह समाज के नागरिकों के सिविल अथवा व्यक्तिगत अधिकारों पर कोई समानांतर नियम लागू करने की विधिक शक्ति नहीं रखता है।

काजी अधिनियम 1880 का पूर्ण विवरण और बोर्ड के दावे का खंडन

इस पूरे मामले के विधिक धरातल को समझने के लिए जब हमारी टीम ने काजी अधिनियम,1880   Kazis Act,  के ऐतिहासिक और विधिक दस्तावेजों की गहन पड़ताल की, तो स्थिति और स्पष्ट हो गई। यह केंद्रीय कानून भारत के सबसे संक्षिप्त और पुराने कानूनों में से एक है, जिसमें कुल मिलाकर केवल 4 मुख्य कार्यकारी धाराएं शामिल हैं। इतिहास के अनुसार, मुगल शासन के समय काजियों के पास दीवानी और पारिवारिक मामलों के न्यायिक अधिकार होते थे, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने सन 1864 में वापस ले लिया था। तत्पश्चात, सर सैयद अहमद खान के नेतृत्व में मुस्लिम समाज की मांग पर ब्रिटिश संसद ने 1880 में यह विशेष अधिनियम पारित किया, ताकि राज्य सरकारों को स्थानीय मुस्लिम समुदाय की इच्छा पर आधिकारिक काजी नियुक्त करने की प्रशासनिक शक्ति दी जा सके। इस कानून की धारा 2 राज्य सरकारों को यह अधिकार देती है कि यदि किसी विशिष्ट स्थानीय क्षेत्र के मुस्लिम नागरिक ऐसा चाहते हैं, तो सरकार वहां के लिए एक या अधिक योग्य व्यक्तियों को काजी नियुक्त कर सकती है। वहीं, अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत नियुक्त मुख्य काजी को अपनी सहायता के लिए एक सहायक अथवा ‘नायब काजी’ नियुक्त करने का विधिक अधिकार प्राप्त होता है। छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के नए नियमों के विपरीत, इस केंद्रीय कानून की धारा 4 सबसे महत्वपूर्ण विधिक सुरक्षा कवच प्रदान करती है। धारा 4 स्पष्ट रूप से यह प्रतिपादित करती है कि इस अधिनियम के तहत नियुक्त किसी भी काजी के पास कोई न्यायिक अथवा प्रशासनिक शक्ति नहीं होगी, और न ही निकाह संपन्न कराने पर उनका कोई एकाधिकार Monopoly होगा। कानून का स्थापित सिद्धांत यह है कि देश में किसी भी योग्य मुस्लिम व्यक्ति द्वारा शरिया के सिद्धांतों के अनुरूप संपन्न कराया गया निकाह विधिक रूप से पूर्ण मान्य है, और इसके लिए किसी सरकारी या बोर्ड द्वारा अधिकृत काजी की अनिवार्यता विधिक रूप से आवश्यक नहीं है। जब देश का एक केंद्रीय कानून यह साफ करता है कि निकाह संपन्न कराने पर किसी भी संस्था का एकाधिकार नहीं हो सकता, तो राज्य का वक्फ बोर्ड अपनी प्रशासनिक शक्तियों का विस्तार करके केंद्रीय अधिनियम की मूल भावना को निष्प्रभावी नहीं कर सकता।

नए वक्फ कानून के विशिष्ट संशोधन और जिला कलेक्टर को हस्तांतरित शक्तियां

इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण विधिक पहलू केंद्र सरकार का नया वक्फ अधिनियम है, जो देश भर के वक्फ बोर्डों के असीमित अधिकारों को संकुचित (सीमित) करने का प्रावधान रखता है। वक्फ (संशोधन) विधेयक के विशिष्ट विधिक प्रावधानों के अनुसार, देश भर की सभी वक्फ संपत्तियों, विवरणों, खातों और पंजीकरण की विधिक निगरानी के लिए एक केंद्रीय “पोर्टल और डेटाबेस” Portal and Database की व्यवस्था अनिवार्य की गई है, जिसके माध्यम से डिजिटलाइजेशन को बढ़ावा दिया जा सके। हालांकि, इस नए कानून के तहत वक्फ संपत्तियों का सर्वे, नामांतरण म्यूटेशन और स्वामित्व से संबंधित विवादों के निपटारे का अंतिम अधिकार वक्फ बोर्ड से वापस लेकर जिला कलेक्टर  को हस्तांतरित किया गया है। इसके साथ ही, मूल अधिनियम की धारा 40 को पूरी तरह से विलोपित समाप्त कर दिया गया है, जो पूर्व में वक्फ बोर्ड को स्वयं यह निर्धारित करने का विशेषाधिकार देती थी कि कोई संपत्ति वक्फ के दायरे में आती है अथवा नहीं। विधिक और प्रशासनिक जानकारों का मुख्य प्रश्न यही है कि जब देश का केंद्रीय कानून वक्फ बोर्ड के मूल प्रशासनिक एवं संपत्ति संबंधी अधिकारों को ही संकुचित कर रहा है, तो राज्य स्तर पर वक्फ बोर्ड किस विधिक प्रावधान के अंतर्गत नागरिकों के व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) को नियंत्रित करने अथवा स्वतंत्र विधिक अधिकार क्षेत्र निर्मित कर सकता है?

सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) का रुख और अनुच्छेद 21 का विधिक संरक्षण

इस विधिक असमंजस के बीच सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़ माननीय सर्वोच्च न्यायालय सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश है, जो इस नए केंद्रीय कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में धार्मिक स्वायत्तता का संरक्षण करते हुए नए कानून की कुछ विवादास्पद धाराओं पर अंतरिम रोक अवश्य लगाई थी, किंतु न्यायालय ने ‘वक्फ बाई यूजर’ की समाप्ति और समय सीमा कानून Limitation Act की प्रामाणिकता जैसे मूलभूत प्रशासनिक सुधारों को पूरी तरह वैध माना है। इसके अतिरिक्त, देश की उच्च न्यायपालिका पूर्व में कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे शफीन जहां बनाम अशोकन मामला) में यह स्पष्ट कर चुकी है कि दो वयस्क नागरिकों के विवाह के अधिकार में किसी भी तीसरी संस्था अथवा बोर्ड का हस्तक्षेप भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 Right to Privacy & Choice का सीधा उल्लंघन माना जाएगा। ऐसे में किसी राज्य स्तरीय वक्फ बोर्ड द्वारा बिना विधायी प्रक्रिया के स्वतंत्र रूप से नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों को नियंत्रित करने वाली ‘स्क्रूटनी कमेटियां’ गठित करना, उच्च न्यायपालिका के स्थापित विधिक सिद्धांतों के विपरीत प्रतीत होता है।

हमारी विशेष विधिक पड़ताल: महाराष्ट्र का ऐतिहासिक ‘क़ज़ात सिस्टम’ और छत्तीसगढ़ से इसका अंतर

इस संदर्भ में जब हमारी टीम ने विधिक पड़ताल की, तो महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र की व्यवस्था से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण शासकीय दस्तावेज़ सामने आए, जो छत्तीसगढ़ की विधिक स्थिति से बुनियादी अंतर को स्पष्ट करते हैं। पड़ताल के अनुसार, मराठवाड़ा क्षेत्र में निज़ाम शासन काल से ही लगभग 200 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक ‘क़ज़ात व्यवस्था’ कार्यरत थी, जहाँ ‘इनाम कमिश्नर’ और काजियों को नियंत्रित करने वाली सरकारी संस्थाएं सक्रिय थीं। स्वतंत्रता के उपरांत जब महाराष्ट्र राज्य का पुनर्गठन हुआ, तब वहाँ ‘काजी अधिनियम, 1880’ और ‘काजी (महाराष्ट्र संशोधन) अधिनियम, 1978’ को लागू किया गया। इसके पश्चात महाराष्ट्र सरकार ने विशेष शासनादेश संख्या WKF-4460/13508-W, दिनांक 04-03-1960 तथा नवीनतम क्रमांक वक्फ 2021/प्र.क्र.114/का-4, दिनांक 24-02-2022 के माध्यम से काजियों और निकाह प्रणाली की सामान्य देखरेख तथा मैरिज बुकलेट और सियाहनामा के वितरण का उत्तरदायित्व वक्फ बोर्ड को प्रत्यायोजित (Delegate) किया था। इस विधिक खोज से यह तकनीकी अंतर पूर्णतः स्पष्ट होता है कि महाराष्ट्र वक्फ बोर्ड के पास राज्य सरकार का विशिष्ट शासनादेश और ऐतिहासिक विधिक बैकअप उपलब्ध है, जबकि छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड ने राज्य सरकार के किसी आधिकारिक राजपत्र (Gazette Notification) अथवा कैबिनेट की संस्तुति के बिना सीधे अपने स्तर पर यह नियमावली घोषित की है। विधिक विश्लेषकों के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय किए गए वर्तमान विधिक ढांचे के अंतर्गत छत्तीसगढ़ बोर्ड के इस आदेश का न्यायिक समीक्षा में टिक पाना अत्यंत कठिन होगा।